Tuesday, May 21, 2019

يوروفيجن 2019 : هولندا تفوز بالمسابقة في نسختها الرابعة والستين

فاز المغني الهولندي دانكن لورانس بمسابقة الأغنية الأوروبية يوروفيجن لعام 2019 التي جرت فعالياتها في تل أبيب في إسرائيل.
وحصدت هولندا 492 نقطة لتحل في المركز الأول بأغنية "اركاد".
وقال لورانس "هذا هو الحلم الكبير، الموسيقى تأتي أولاً ودائماً".
وكانت هولندا فازت آخر مرة بمسابقة يوروفيجن في عام 1975، واحتفى الجمهور بلورانس نهاية الحفل وشاركوه بغناء أغنيته الفائزة.
واحتلت إيطاليا المركز الثاني برصيد 465 نقطة، فيما احتلت روسيا المركز الثالث بـ 369 نقطة.
من الحروب وأعمال الشغب إلى بطولات كأس العالم العالم واستعراضات النجوم على السجادات الحمر، يظل المصور الصحفي جاهزاً لالتقاط الصور التي تحكي القصة في جزء من الثانية.
يعرض أعضاء من جمعية مصوري الصحافة البريطانية أفضل أعمالهم خلال العامين الماضيين في معرض بارغ هاوس بوسط لندن.
تم اختيار الشاب بلال حسني، نجم الانستغرام والناشط في الدفاع عن حقوق المثليين، لتمثيل فرنسا في مسابقة الأغنية الأوروبية (عدد متابعي يوروفيجن حول العالم 186 مليون شخص) التي تقام في تل أبيب بإسرائيل في 18 من مايو/أيار الحالي. كما تم اختيار المطرب الكردي من تركيا سرحد حاجي باشلي أوغلو لتمثيل سان مارينو للمرة الثانية على التوالي. هذه نبذة عنهما.
وُلد بلال حسني في باريس عام 1999 لأبوين مغربيين. وكان نجماً كبيراً على الإنترنت حتى قبل تأهله لتمثيل فرنسا في يوروفيجن بسبب مظهره المتجدد الذي يميل لشكل النساء أكثر منه للرجال.
ولديه أكثر من نصف مليون متابع على موقع انستغرام و801 ألف متابع على قناته في موقع يوتيوب، و128 ألف على تويتر.
ازداد عدد متابعي بلال في الأونة الأخيرة، إذ يحظى كل منشور له على انستغرام بعشرات آلاف الإعجابات بسبب "شخصيته المؤثرة والحيادية" تجاه العديد من القضايا الخلافية، مثل دفاعه عن المثليين والمتحولين.
كما جذب مظهره المتجدد وأزياؤه النسائية تارة والرجالية تارة أخرى، وتغييره المستمر لأنواع الشعر المستعار التي يستخدمها، العديد من المتابعين.
ويشارك بلال في مناسبات ومظاهرات المثليين وينشر صورهم ومقاطعهم المصورة في صفحاته في مواقع التواصل الاجتماعي.
ظهرت أعمال فنية تصور الأعضاء الجنسية للنساء على أبواب الحمامات العامة في أنحاء العاصمة البريطانية لندن، كجزء من حملة لتشجيع النساء على النظر بإيجابية إلى أجسادهن، وتحديدا "الأجزاء الحساسة" منها.
وتقف وراء حملة الرسومات هذه الفنانة أولويا بوبر، 23 سنة، التي تقول إنها تلقت أصداءً إيجابية على ما تقوم به.
وقالت لراديو 1 نيوزبيت :"غالبا ما تشعر النساء بالخجل من مظهرهن، وخاصة ما يتعلق بالجزء الأكثر خصوصية وحساسية (الأعضاء الجنسية)، وهذه تجربة غير سارة حقا".
لكنها تشدد على أن مظهر الأعضاء الجنسية للمرأة بات طبيعيا " فإذا أخذنا بنظر الاعتبار الافلام الإباحية، نجد أنها قد جعلت مظهر العضو الجنسي للمرأة يبدو أمرا طبيعيا، وإذا كان لديك احساس مختلف عن هذه الرسالة فإنه هذا ربما أمر غير جيد، وهو شيء خاطئ تماما".
وقد أطلقت حملة الرسومات هذه من خلال شركة بودي فورم، كجزء من حملة حملت عنوان فيفا لا فولفا Viva La Vulva.
وعلى الرغم من أنها ترسم أعضاء حساسة في الأماكن العامة، لا تعتقد أولويا أن في فنها ما يسيء أو يخدش الحياء.
إذ تقول "لا أعتقد أن الأعضاء الجنسية، في حد ذاتها، يجب أن تكون ذات دلالات إيجابية أو سلبية، لأنها مجرد أعضاء" في الجسم الإنساني.
وتضيف "هذا هو المعنى الذي نضفيه عليها، بأنها يمكن أن تكون شيئا إيجابيا أو سلبيا".
على الرغم من أن الشائع رؤية رسوم وخربشات تصور الأعضاء الجنسية للرجال في المراحيض العامة، إلا أن عضو المرأة لا يحظى بنفس الاهتمام.
ويعتقد المحلل النفسي ديفيد مورغان، أن هناك العديد من رسومات الأعضاء الجنسية للذكور لأنها "تمثل قلقا بشأن النشاط الجنسي للذكور".
وأضاف: "يتعامل الذكور معه (القلق) من خلال رسم أعضائهم الجنسية في كل مكان وتركها في وجه الجميع".
ويكمل "عندما يرى شخص ما عضوا ذكوريا على الحائط، ثمة صدمة خفيفة، ومن خلال هذا التصرف فإن الشخص يعكس مخاوفه الخاصة من خلال عرضها على أشخاص آخرين".
تقول أولويا إنها كونت نظريتها الخاصة في هذا الصدد.
وتوضح: "في مراحيض النساء، عادة ما يكون نوع الغرافيتي الذي يظهر على الجدران بمثابة نوع من التمكين للمرأة أو اعترافات تحت تأثير الكحول لنساء أخريات".
وتخلص إلى القول "لكنني أعتقد جزئيا أن السبب وراء وجود أعضاء ذكورية عادة، هو أن هناك صعوبة كبيرة في رسم فرج المرأة من الذاكرة إذا حاول أحد هذا".
"وأعتقد أيضا أن الرجال يشعرون بالفخر (بأعضائهم الجنسية) أكثر من النساء، لذلك قد يكون ذلك السبب"

Monday, May 6, 2019

रमज़ान का चांद और कुछ सवालः वुसअत का ब्लॉग

आज शाम चांद नज़र आ जाएगा और कल से रमज़ान शुरु हो जाएगा.
सरकारी दफ्तरों में कल तक इसलिए काम नहीं हुआ क्योंकि गर्मी बहुत है. कल से इसलिए नहीं होगा क्योंकि रोज़ा रख के काम कौन करता है.
वैसे तो मैं उपवास भी कह सकता हूं, पर मेरे कई दोस्त बुरा मान सकते हैं. क्योंकि रोज़ा मुसलमान रखते हैं और उपवास हिंदू.
जो रोज़ा रखते हैं वो फास्टिंग नहीं कर सकते, क्योंकि फास्टिंग तो क्रिश्चियन करते हैं.
यूं तो एक साल में 12 चांद होते हैं लेकिन इनमें से 10 चांद जनता देखती है और रमज़ान और ईद के चांद केवल चांद देखने वाली कमेटी को नज़र आते हैं.
1400 वर्ष पहले चूंकि विज्ञान नहीं था इसलिए चांद ज्ञान की मदद से देखा जाता था.
पर आज पहली तारीख़ का चांद किस दिन किस समय नज़र आएगा, उसकी अगले सौ वर्ष तक की जंत्री बनाना संभव है.
इसीलिए भारत और पाकिस्तान को छोड़ कर लगभग हर मुस्लिम देश में रमज़ान और ईद का एक ही चांद नज़र आता है.
और जो व्यक्ति सरकारी चांद से हट कर दूसरा चांद देखने की कोशिश करें, उसे सरकारें दिन में तारे दिखा देती हैं.
वैसे तो चांद देखने का इस्लामी तरीक़ा ये है कि उसे नंगी आंख से दिखाई देना चाहिए, मगर पहली तारीख़ के चांद की उम्र सिर्फ़ बीस-पच्चीस मिनट ही होती है.
पुराने ज़माने में जब इतना प्रदूषण नहीं था तब रेगिस्तान में पहली का चांद हर कोई आसानी से देख सकता था.
पर आज तो धुंए और धूल के कारण चांद तो रहा एक तरफ़, ख़ुद नीला आकाश देखना ही कठिन है.
इसीलिए अब चांद देखने के लिए मौसम विभाग के सांइस चार्ट और विमानों की मदद ले कर ये मसला आसानी से हल हो सकता है.
पर अपने उपमहाद्वीप में उलेमा हज़रात चांद देखने के लिए सिर्फ़ उस हद तक आधुनिक उपकरणों की मदद लेते हैं, जहां तक चांद देखने का उनका हक़ ख़त्म न हो.
उन्हें चांद देखने के लिए किसी ऊंची बिल्डिंग का छत पर अंग्रेज़ की बनाई लिफ्ट के ज़रिए पहुंचने या अंग्रेज़ी दूरबीन के इस्तेमाल में कोई आपत्ति नहीं. पर अंग्रेज़ों के बनाए मौसम विभाग की भविष्यवाणी और चांद के वैज्ञानिक चार्ट पर उनका बिल्कुल भी ऐतबार नहीं.
ऐतबार कर लिया तो फिर चांद देखने के लिए मौलवी हज़रात की ज़रूरत क्या रहेगी?
जहां तक आम नागरिक का मामला है तो उसके लिए चांद देखना बिल्कुल ज़रूरी नहीं.
जिस दिन नींबू दो सौ रूपये किलो की बजाय साढ़े चार सौ रूपये किलो और इफ्तारी के पकौड़ों का बेसन डेढ़ सौ रूपये किलो से उछल के साढ़े तीन सौ रूपये के पायदान पर पहुंच जाए समझिए रमज़ान शुरु हो गया.
यानी रमज़ान उस महीने को कहते हैं जिसमें रोज़ेदार सवाब कमाए और दुकानदार पैसा.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया में ख़बर है कि भारतीय सेना ने मेजर लीतुल गोगोई को कड़ी फटकार लगाई है और साथ ही पेंशन के लिए उनकी वरिष्ठता में छह महीने की कटौती कर दी है.
मेजर गोगोई को ये सज़ा कश्मीर में एक स्थानीय लड़की के साथ दोस्ती करने, उसे होटल में लेकर जाने और स्थानीय लोगों से झगड़ा करने का दोषी पाए जाने पर दी गई है.
अभी पिछले महीने ही उनके ख़िलाफ़ कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया पूरी की गई थी.
मेजर गोगोई पहली बार चर्चा में तब आए थे जब साल 2017 में उन्होंने कश्मीरी युवक को ह्यूमन शील्ड यानी मानव ढाल बनाकर सेना की जीप से बांध दिया था.
इसके लिए सेना प्रमुख बिपिन रावत ने उन्हें सम्मानित भी किया था.
अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया लिखता है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच पूरी हो जाने के बाद भी समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया जाएगा.
जस्टिस गोगोई पर उनकी ही एक पूर्व जूनियर ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाएं और उनके ख़िलाफ़ विभागीय जांच चल रही है.
ये जांच सुप्रीम कोर्ट के ही तीन जजों की समिति कर रही है जिसमें जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस इंदिरा बैनर्जी शामिल हैं और जस्टिस बोबड़े समिति की अध्यक्षता कर रहे हैं.
समिति अपनी जांच पूरी होने पर रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों को सौंपेगी लेकिन इसे सार्वजनिक नहीं किया जाएगा.

Friday, April 12, 2019

प्रधानमंत्री मोदी की बायोपिक की कहानी कितनी सच्ची

भारत में राजनीतिक दलों को भले ही अपनी आय का ब्योरा सार्वजनिक करना होता है मगर उनकी फ़ंडिंग को लेकर पारदर्शिता नहीं होती.
पिछले साल प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड जारी किए थे जिनके ज़रिये उद्योग और कारोबारी और आम लोग अपनी पहचान बताए बिना चंदा दे सकते हैं.
दानकर्ताओं ने इन बॉन्ड के ज़रिये 150 मिलियन डॉलर यानी क़रीब 10 अरब 35 करोड़ रुपए का चंदा दिया है और रिपोर्ट्स के मुताबिक़ इनमें से ज़्यादातर रक़म बीजेपी को मिली है.
भारत में महिलाएं भी बड़े पैमाने पर वोट कर रही हैं. इतनी ज़्यादा कि यह पहला आम चुनाव है जिसमें पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज़्यादा मतदान करेंगी.
महिला और पुरुष मतदाताओं के बीच की खाई तो 2014 में ही सिकुड़ गई थी जब महिला मतदाताओं का प्रतिशत 65.3 % रहा था जबकि पुरुषों का 67.1%.
2012 से 2018 के बीच दो दर्जन से अधिक स्थानीय चुनावों में दो तिहाई से अधिक राज्यों में पुरुषों के मुक़ाबले महिला मतदाताओं का मतदान प्रतिशत अधिक रहा.
राजनीतिक दलों ने महिलाओं के महत्व को समझा है और उन्हें अधिक 'प्रलोभन' देना शुरू कर दिया है- शिक्षा के लिए क़र्ज़, मुफ़्त गैस सिलेंडर और लड़कियों के लिए साइकिल.
2014 में मोदी ने बीजेपी और इसके सहयोगियों को ऐतिहासिक जीत दिलाई थी.
बीजेपी ने जिन 428 सीटों पर चुनाव लड़ा था, उनमें से 282 सीटें जीत ली थीं. 1984 के बाद से यह पहला मौक़ा था जब किसी पार्टी ने आम चुनाव में अकेले पूर्ण बहुमत हासिल किया था.
इस बड़ी जीत का श्रेय भ्रष्टाचार मुक्त 'अच्छे दिन' लाने का वादा करने वाले नरेंद्र मोदी को दिया गया जिनके अंदर ख़ुद को निर्णय लेने वाला और मेहनती नेता के तौर पर प्रचारित करने की क्षमता थी.
अपने वादों को पूरा करने में अच्छा प्रदर्शन न कर पाने के बावजूद मोदी अपनी पार्टी के लिए वोट खींचने वाला मुख्य चेहरा हैं. उन्हें पार्टी के अंदर की अनुशासित मशीनरी का समर्थन भी हासिल है जिसे उनके विश्वासपात्र और शक्तिशाली सहयोगी अमित शाह चलाते हैं.
विश्लेषक मानते हैं कि इस साल के आम चुनाव एक तरह से नरेंद्र मोदी के लिए जनमतसंग्रह हैं.
विपक्ष का अभियान पूरी तरह से प्रधानमंत्री को निशाने पर लेने पर केंद्रित रहेगा जो कि ध्रुवीकरण करने वाले ऐसे नेता हैं जिनके चाहने वाले भी हैं तो नापसंद करने वाले भी.
ऐसे में माना जा रहा है कि संसदीय चुनावों में राष्ट्रपति चुनावों जैसा मुक़ाबला हो रहा है. वोटों की गिनती के बाद ही पता चलेगा कि मोदी टिकाऊ ब्रैंड बने रहते हैं
पार्टी लगातार गर्त में जाती दिख रही थी. इसके नेता राहुल गांधी जो कि चर्चित नेहरू-गांधी परिवार की चौथी पीढ़ी से हैं, सोशल मीडिया पर चुटकुलों के पात्र बन गए थे.
मगर दिसंबर में पार्टी में नई जान सी आती दिखी.
पहले से अधिक आश्वस्त और ऊर्जावान राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने उत्तर भारत के तीन राज्यों में सरकार बनाने में सफलता पाई.
कई लोगों ने इसकी वजह सत्ता विरोधी लहर बताई क्योंकि तीन में से दो राज्यों में तो बीजेपी कई सालों से राज कर रही थी. मगर राहुल गांधी और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं से श्रेय नहीं छीना जा सकता.
साफ़ है कि कांग्रेस के अंदर फिर से पुराना जादू लौटा है. राहुल गांधी ने मोदी के सामने ख़ुद को एक खुले और समावेशी नेता के तौर पर पेश किया है. फिर एक चौंकाने वाले फ़ैसले के तहत उनकी बहन प्रियंका गांधी का पार्टी में आधिकारिक तौर पर आना पार्टी के प्रचार अभियान में नई जान डाल गया.
कांग्रेस के इस तरह से फिर से उठने से बिखरे पड़े विपक्ष में भी उत्साह आया है. इससे 2019 का मुक़ाबला पहले के अनुमानों से और अधिक कड़ा हो गया है.
7. अर्थव्यवस्था
मोदी के शासन में एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अपनी रफ़्तार खोती हुई नज़र आ रही है.
खेती की भरमार और सामानों के दाम घटने के कारण खेतों से होने वाली आय स्थिर हो गई. इससे किसान क़र्ज़ में डूब गए और सरकार से उनकी नाराज़गी बढ़ गई.
2016 में लिया गया विवादास्पद नोटबंदी का फैसला पेचीदा तो था ही, इसके अलावा इसे सही तरीक़े से लागू नहीं किया गया. जीएसटी भी लघु और मध्यम उद्योगों के लिए नुक़सानदेह रहा. भारत की विशाल अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में बहुत से लोग नौकरियां गंवा बैठे.
निर्यात घट गया है, बेरोज़गारी बढ़ गई है और मोदी सरकार पर नौकरियों का डाटा छिपाने का आरोप भी लगा है. यही नहीं, भारत में कई सरकारी बैंकों की हालत क़र्ज़दारों द्वारा ऋण न लौटाए जाने के कारण डूबने की कगार पर हैं.
या नहीं.
6. भारत की पुरातन पार्टी कर रही वापसी की उम्मीद
क्या 133 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी रसातल से बाहर निकल सकती है?
2014 में पार्टी को आम चुनावों में अपनी सबसे करारी हार का सामना करना पड़ा. इसकी सीटों की संख्या पिछले चुनावों (2009) की 206 सीटों की तुलना में 44 ही रह गई. इसे 20 प्रतिशत से भी कम मतदाताओं ने वोट दिया.
अगले चार सालों तक पार्टी राज्यों के चुनाव लगातार हारती चल गई और इसकी हालत पतली ही रही. 2018 के मध्य तक कांग्रेस और इसके सहयोगी दल मात्र तीन राज्यों में सरकार चला रहे थे जबकि बीजेपी की सरकार 20 राज्यों में थी.

Tuesday, April 2, 2019

'राजनीतिक दलों की साजिश'

बिहार में इस बात को हर कोई जानता है कि तेज प्रताप अपने बाग़ी तेवर के साथ पार्टी और परिवार में अलग-थलग पड़ गए हैं. तेज प्रताप ने पार्टी और परिवार के बाद पत्नी से भी विद्रोह कर लिया लेकिन यहां भी वो अकेले पड़ गए. आरजेडी के एक प्रवक्ता ने बताया कि राबड़ी देवी एश्वर्या को बहुत मानती हैं और तलाक़ के मामले में पूरा परिवार तेज प्रताप नहीं बल्कि एशवर्या के साथ खड़ा है.
1990 के दशक से लेकर 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव तक लालू प्रसाद का बिहार के चुनाव में प्रभावी दख़ल रहा है लेकिन 2019 के आम चुनाव में जब राष्ट्रीय जनता दल सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा है तो लालू जेल में हैं. यह तेजस्वी के लिए भी इम्तिहान है लेकिन तेज प्रताप उनके लिए सबसे बड़ा सवाल बन गए हैं.
मेरठ के हाशिमपुरा मोहल्ले को एक सड़क चीरती हुई निकलती है और इसे दो भागों में बाट देती है. इसके एक तरफ़ हाजी बाबुद्दीन जैसे मुस्लिम आबाद हैं और दूसरी तरफ विपिन कुमार रस्तोगी जैसे हिन्दुओं की दुकानें हैं.
बाबुद्दीन और रस्तोगी एक दूसरे को 30 साल से जानते हैं लेकिन इनकी दुनिया बिलकुल अलग है.
बाबुद्दीन भारतीय जनता पार्टी के कट्टर विरोधी हैं और रस्तोगी इस पार्टी के कड़े समर्थक. हमेशा की तरह इस बार भी तय है कि 11 अप्रैल को आम चुनाव के पहले चरण में बाबुद्दीन महागठबंधन के प्रत्याशी और पूर्व राज्य मंत्री हाजी याक़ूब क़ुरैशी को अपना वोट देंगे और रस्तोगी दो बार सांसद रह चुके बीजेपी के उमीदवार राजेंद्र अग्रवाल को.
इनके बीच कुछ समान नहीं है. लेकिन, पिछले 30 सालों से एक सच ने इन्हें एक-दूसरे से कस कर बाँध रखा है और वो है कारोबार में एक-दूसरे पर निर्भरता. वहां रहने वाले लोगों के अनुसार ये कारोबार सालाना 300 करोड़ रुपये का है.
बाबुद्दीन 120 पॉवरलूम मशीनों के मालिक हैं और मेरठ के दो सबसे अमीर बुनकरों में से एक हैं. दो मंज़िला घर के ऊपर वो अपने परिवार के साथ रहते हैं जहाँ अभी उन्होंने एक आधुनिक रसोई घर बनवाई है, जिसे वो गर्व के साथ लोगों को दिखाते हैं. हिंदू मुसलमान विवादों के आविष्कार का सियासी फ़ॉर्मूला
मकान के नीचे कपड़ा बनाने वाली मशीनें लगी हैं जिनसे हर वक़्त तेज़ आवाज़ें निकलती रहती हैं.
उनके कारख़ाने में कपड़े बनते हैं जिसे रस्तोगी थोक में ख़रीदते हैं. वो बाबुद्दीन के अकेले ग्राहक नहीं हैं लेकिन उनके सभी हिन्दू थोक ग्राहकों में सबसे ज़्यादा माल ख़रीदने वाले ज़रूर हैं.
बाबुद्दीन कहते हैं, "हिन्दू थोक दुकानदारों के बग़ैर मेरा काम नहीं चलता और हम बुनकरों के बग़ैर उनका नहीं. हम एक-दूसरे पर पूरी तरह से निर्भर हैं."
रस्तोगी के मुताबिक़, "धंधे में विचारधारा, धर्म और जाती काम नहीं आतीं. बाबुद्दीन को मैं 30 सालों से जानता हूँ. वो एक परिवार की तरह हैं. हमारे विचार अलग हैं. हम वोट अलग-अलग पार्टियों को देते हैं. मज़ाक़ में एक-दूसरे की खिंचाई ज़रूर करते हैं मगर हम धंधे में भावना को जगह नहीं देते."
आर्थिक मजबूरी उन्हें एक-दूसरे से बांध कर रखती है. थोड़े समय के लिए रस्तोगी ने एक अलग व्यापार शुरू किया था जो नहीं चला. जब वो वापस लौटे तो उनका अनुभव बहुत अच्छा था.
वो भावुक होकर कहते हैं, "मुस्लिम बुनकरों ने मेरा ऐसा स्वागत किया कि मुझे लगा कि मैं अपने परिवार में वापस आ गया हूँ."
कपड़ों के अलावा कई दूसरे व्यवसायों में भी हिन्दू-मुस्लिम समाज की एक-दूसरे पर निर्भरता दिखाई देती है जो सराहनीय है क्यूंकि सांप्रदायिक दंगों के इतिहास वाला मेरठ शहर हिन्दू-मुस्लिम के बीच नाज़ुक रिश्ते के लिए जाना जाता है.
अफवाहों के कारण भी यहाँ सांप्रदायिक तनाव पैदा हो जाता है. लेकिन बाबुद्दीन और रस्तोगी जैसे लोगों के बीच घनिष्ट संबंधों के कारण अक्सर मामला बेकाबू नहीं होता.
मेरठ के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दूसरे शहरों और ग्रामीण इलाक़ों में भी हिन्दू-मुस्लिम आर्थिक निर्भरता की मिसालें मिलती हैं. शामली के सलीम त्यागी कहते हैं कि उनके शहर में गन्ने की काश्त हो या मुरादाबाद में पीतल का काम दोनों समुदायों का एक-दूसरे के बग़ैर गुज़ारा नहीं हो सकता.
कैराना में बीजेपी कार्यकर्ता शिव कुमार चौहान गुर्जर समाज से हैं. जब हमने उनसे बात की तो उनके साथ बीजेपी के कुछ और कार्यकर्ता भी बैठे थे.
हुक़्क़े पे चली चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि यहाँ चुनाव में बीजेपी और गठबंधन दोनों ने गुर्जर उम्मीदवार खड़े किये हैं. समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) के महागठबंधन की उम्मीदवार तबस्सुम हसन आरएलडी की हैं. उन्होंने जब 2018 में उपचुनाव जीता था तो उन्हें हिन्दू और मुस्लिम गुर्जरों दोनों ने वोट दिया था.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की आबादी 27 प्रतिशत है. राष्ट्रीय औसत केवल 14 प्रतिशत के मुक़ाबले में ये कहीं ज़्यादा है. इनमें 70 प्रतिशत किसान हैं.
यहाँ के अधिकतर मुसलमान ग़रीब हैं. उनके पूर्वज हिन्दू थे. इसलिए जाट और गुर्जर हिन्दू समाज में भी हैं और मुस्लिम समुदाय में भी. अधिकतर मुस्लिम धनी हिन्दू जाटों के खेतों पर काम करते हैं.
पिछले आम चुनाव से पहले मुज़फ़्फ़रनगर और शामली जैसे शहरों और देहातों में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे जिसमें हिन्दू जाटों और मुस्लिम समाज के बीच दशकों से चली आ रही सांप्रदायिक सद्भावना प्रभावित हुई थी.
इसका नतीजा ये हुआ कि समाज सांप्रदायिक मुद्दों पर बंट गया. मतों के ध्रुवीकरण के नतीजे में हिन्दुओं ने बीजेपी को वोट दिया और मुसलमानों ने बीजेपी के ख़िलाफ़.
बीजेपी ने यहाँ की तमाम 8 सीटें आसानी से जीत लीं. पहले चरण के रुझान को देखते हुए बाक़ी के चरणों में उत्तर प्रदेश के दूसरे इलाक़ों में भी मत बीजेपी के हक़ में पड़ा. पार्टी ने राज्य की 80 सीटों में से 71 सीटें जीतीं.

Monday, January 21, 2019

بعد هزيمة بونابرت في عكا سعى في القاهرة إلى استصدار فتوى دينية

بعد هزيمة بونابرت في حصار عكا عاد إلى القاهرة وسعى إلى استصدار فتوى دينية "تأمر الشعب بأن يؤدي له قسم الولاء"، وهو طلب أحرج الشيوخ وكان بمثابة اختبار منه لمدى ولائهم له، لكن سرعان ما وجد العلماء مخرجا وبادروه يسألونه لماذا لا يعلن إسلامه وجيشه طالما يقر بإعجابه بنبي الإسلام، ويعزي نجاحاته إلى حماية الله له؟
يقول الجنرال برتران إن بونابرت قرر المخادعة وقال "هناك افتراضان يعترضان إمكانية اعتناقه هو وجيشه الإسلام وهما :الختان وتحريم شرب الخمر. والأهم من ذلك أنه قبل أن يصل إلى عملية الاعتناق هذه، يجب أن تُمنح فرق الجيش الوقت الكافي للتعرف على عقائد الإسلام وممارساته وأنهم بحاجة إلى عامين لتحقيق ذلك".
ويذهب المؤرخ الفرنسي هنري لورانس في دراسته "بونابرت والإسلام" إلى إن بونابرت أفضى إلى الكونت لاس كاسي في "مذكرات سانت هيلين" في المنفى، المعروفة باسم "الميموريال"، أنه كان عازما ي حالة استسلام عكا على أن أُلبس جنودي الزي الشرقي وأن يتبعوا، في الظاهر على الأقل، ديانة البلد، الأمر الذي سيروق للجنود كثيرا".
استمرت حماسة بونابرت "الإسلامية" حتى هزيمته في عكا، وير
كان بونابرت قادرا على التمييز بين الصفقات الرابحة والخاسرة، فقرر الفرار خلسة من مصر في أغسطس/آب 1799 تاركا وراءه رسالة إلى قائده الأبرز الجنرال كليبر يحمّله مسؤولية قيادة مصر وجيش الشرق.
وخلال إقامته الأخيرة في القاهرة، وفقا للمؤرخ هنري لورانس، يتعين على القائد العام ألا يسمح بتسريب شيء عن نواياه، فتوجه بالخطاب إلى ديوان القاهرة مستعيدا حديثه عن دوره كمرسل من الله، وفقا لما جاء في "التاريخ العلمي والعسكري للحملة الفرنسية" لريبو:
"أو ليس حقا أنه قد جاء في كتبكم أن كائنا أرقى سوف يصل من الغرب مكلفا بمواصلة عمل النبي ؟ أو ليس حقا أنه جاء فيه أيضا أن هذا الرجل، هذا الوكيل لمحمد هو أنا؟"
هرب بونابرت إلى فرنسا في جنح الليل في 23 أغسطس/آب 1799 وترك رسالة بالغة الأهمية لقائده كليبر يوصيه فيها:
"إن من يكسب ثقة كبار الشيوخ في القاهرة يضمن ثقة الشعب المصري، وليس بين رؤساء الشعب من هم أقل خطرا من شيوخه، لأنهم قوم هيابون لم يألفوا خوض غمار القتال، على أنهم رمز للتعصب ولو أنهم ليسوا متعصبين، فهم من هذه الوجهة يشبهون القسس".
صد المؤرخون إدراك بونابرت أن مغامرته الشرقية قد انتهت تحت أسوارها، وأن أوروبا هي قدره وليس مصر، فبدأ اهتمامه بالإسلام يخبوا على نحو ملحوظ، وفي منفاه في سانت هيلين يصرح للجنرال برتران في مذكراته أن بياناته إلى المسلمين لم تكن غير احتيال:
"كان هذا احتيال، لكنه احتيال من أعلى طراز، ومن جهة أخرى فإن ذلك لم يكن إلا لأجل ترجمته إلى أبيات عربية جميلة... وقال (بونابرت) إن الفرنسيين الذين كانوا معي لم يجدوا في ذلك غير مادة للضحك، وكانت استعداداتهم في هذا الصدد فاترة".

Thursday, December 20, 2018

التغير المناخي: توافق على تفعيل اتفاق باريس

اتفق ممثلو نحو 200 دولة على تفعيل تفعيل اتفاق باريس للمناخ المبرم عام 2015 لمواجهة ظاهرة التغير المناخي.
وهددت الخلافات التي نشبت بين الأطراف الحاضرة بتعطيل توقيع الاتفاق الجديد الذي يهدف إلى تفعيل اتفاقية باريس بحلول العام 2020.
ويعتقد الموقعون على الاتفاق أنه سيلزم الأطراف الموقعة على اتفاقية باريس بتخفيض معدل انبعاثات غاز ثاني أكسيد الكربون.
ويهدف اتفاق باريس إلى تقليل معدل ارتفاع درجة حرارة الأرض إلى ما دون درجتين مئويتين لمحاولة إعادة الاتزان للبيئة والمناخ على الكوكب.
وتساهم الدول الغنية غالبا في تقليل معدل انبعاث الكربون عبر تمويل برامج تقليل الانبعاثات في دول أخرى في أفريقيا وأسيا لكن هذه البرامج يصعب مراقبتها.
أما الدول الفقيرة والنامية فتطالب في الغالب بتعويضات مالية عن الأضرار التي تقع عليها بسبب ارتفاع درجة الحرارة عالميا بسبب الانبعاثات المتزايدة لغاز ثاني أكسيد الكربون من الدول الصناعية الكبرى.
ولطالما أرقت فكرة تجريم الأنشطة الصناعية المسببة لارتفاع درجة حرارة الأرض عبر انبعاثات الكربون الدول الغنية التي تخشى من الاضطرار لدفع فواتير باهظة في المستقبل.
والأسبوع الماضي شعر العلماء بالصدمة من اعتراض الولايات المتحدة وروسيا والسعودية والكويت على تقرير الأمم المتحدة الذي يدعو إلى تقليل معدل ارتفاع درجة الحرارة عالميا إلى أقل من 1.5 درجة مئوية.وأشار التقرير إلى أن الوضع الحالي غير جيد على الإطلاق وأن العالم يتجه إلى تسجيل معدل يفوق 3 درجات مئوية في ارتفاع درجات حرارة الكوكب خلال القرن الحالي.
وأضاف
أصبحت رضيعة من جمهورية الكونغو الديمقراطية معجزة طبية ورمزا لمواجهة فيروس إيبولا القاتل، بعد نجاتها من الوباء وعمرها ستة أيام فقط، بحسب ما قاله مسؤولو الصحة في البلاد.
وأُصيبت والدة الرضيعة بنديكت بمرض الإيبولا، وتوفيت أثناء ولادتها وانتقل الوباء للطفلة، التي أصبحت تعرف باسم "معجزة بيني" بعد الشفاء.
وسريعا ظهرت أعراض الفيروس عليها بعد عدة أيام فقط، واستغرق علاجها خمسة أسابيع على مدار الساعة لإبقائها على قيد الحياة.
وتركت بنديكت المستشفى، يوم الأربعاء، وعادت إلى منزلها برفقة والدها وعمتها.
وقالت متحدثة باسم وزارة في الكونغو لبي بي سي: "كان والدها توماس منفعل للغاية... إنها طفلته الأولى" التقرير أن تغيير هذا الوضع "يتطلب عملا سريعا وتغيرا جذريا بشكل غير مسبوق على الكثير من المستويات الاجتماعية".
وتحول مرض الإيبولا إلى وباء وعدوى مميتة في أفريقيا، يتسبب في الحمى الشديدة والقيء والإسهال والنزيف الداخلي والخارجي.
ومن المعروف أن احتمالات النجاة ضعيفة ويموت نصف المصابين تقريبا، ويكون الأطفال أكثر عرضة للخطر وفرصهم في البقاء على قيد الحياة تكون أقل.
وتبقى قصص النجاة من المرض لحالات مثل الطفلة بنديكت نادرة.
وولدت بنديكت في 31 أكتوبر/تشرين الأول 2018، وتلقت العلاج والرعاية في مركز علاج الإيبولا في مدينة بيني، والتي كانت الأكثر تضررا من تفشي المرض في جمهورية الكونغو الديمقراطية.

Monday, November 12, 2018

सीवीसी ने सुप्रीम कोर्ट को देर से सौंपी रिपोर्ट, सॉलिसीटर जनरल ने माफी मांगी

बता दें कि रिश्वतखोरी विवाद में सीबीआई प्रमुख वर्मा और जांच एजेंसी में नंबर दो राकेश अस्थाना को 23 अक्तूबर को छुट्टी पर भेज दिया गया था। अस्थाना ने वर्मा पर रिश्वत लेने के आरोप लगाए थे। इसके बाद सीवीसी ने इस मामले की जांच शुरू की थी। 

सुप्रीम कोर्ट ने वर्मा के खिलाफ सीवीसी जांच की निगरानी के लिए पूर्व जस्टिस एके पटनायक को नियुक्त किया था। कोर्ट ने मामले की जांच दो सप्ताह में पूरी कर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया था। सीबीआई निदेशक वर्मा सीवीसी प्रमुख केवी चौधरी की अगुवाई वाली तीन सदस्यीय आयोग के समक्ष पेश हो चुके हैं और अपना बयान रिकॉर्ड कराया था। वर्मा अपने ऊपर लगे रिश्वतखोरी के आरोपों से इनकार करते रहे हैं।

कैसे हुई विवाद की शुरुआत

सीबीआई के दोनों अधिकारियों वर्मा और अस्थाना ने एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं। इतना ही नहीं सीबीआई ने अपने नंबर दो के अधिकारी के खिलाफ 15 अक्तूबर को एफआईआर दर्ज की थी। वहीं अस्थाना ने 24 अगस्त को वर्मा के खिलाफ कैबिनेट सचिव को पत्र लिखा था। कैबिनेट सचिव ने अस्थाना की शिकायत को सीवीसी के पास भेज दिया था। 

अस्थाना की शिकायत के दो महीने बाद सीबीआई ने उनके, सीबीआई डीएसपी देवेंद्र कुमार, मनोज प्रसाद और सोमेश प्रसाद के खिलाफ 15 अक्तूबर को सतीश बाबू के 4 अक्तूबर को दिए बयान के आधार पर एफआईआर दर्ज की थी। अस्थाना ने वर्मा पर हैदराबाद के व्यवसायी सतीश बाबू सना से 2 करोड़ रुपये घूस के तौर पर लेने का आरोप लगाया है। सना से जांच एजेंसी मीट निर्यातक मोईन कुरैशी से संबंधित मामलों में पूछताछ कर रही थी।

सना का दावा है कि उसने पूछताछ से बचने के लिए सीबीआई के विशेष निदेशक अस्थाना को 3 करोड़ रुपये की घूस दी थी। अस्थाना से उनकी डील दो भाईयों सोमेश और मनोज प्रसाद ने करवाई थी। उनका कहना था कि यदि वह 5 करोड़ रुपये दे देगा तो उसे इस मामले से राहत मिल जाएगी। जिसके लिए वह तीन करोड़ रुपये इन भाईयों को दे चुका था। इसके अलावा सना ने दिल्ली में अस्थाना से मुलाकात करने का दावा किया था।अमेरिका ने बांग्लादेश से रोहिंग्या शरणार्थियों की म्यामांर में स्वैच्छिक और सम्मानजनक वापसी की मांग करते हुए कहा कि ढाका को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उन्हें तमाम गतिविधियों की स्वतंत्रता हो और वे ‘शिविरों तक ही सीमित ना रहें।’ ढाका और ने पी तौ के बीच पिछले महीने लाखों रोहिंग्या मुस्लिमों की मध्य नवंबर में देश वापसी पर सहमति बनी थी। 
यह रोहिंग्या शरणार्थी म्यामांर सेना के चलाए गए अभियान के बाद देश छोड़कर बांग्लादेश चले गए थे। समझौते के तहत पहले जत्थे में बांग्लादेश से 2,000 रोहिंग्या मुसलमान म्यांमा जाएंगे। इसके बाद दूसरा जत्था रवाना होगा। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने रविवार को एक बयान में कहा कि हमने दोनों सरकारों के उच्च स्तर के अधिकारियों को समय से पहले वापसी को लेकर अपनी गंभीर चिंताओं से अवगत करा दिया है।

इस बात पर जोर दिया गया कि अंतरराष्ट्रीय परिपाटी के अनुरूप स्वैच्छिक, सुरक्षित, और सम्मानित तरीके से वापसी हो। इसके अलावा म्यामां वापसी के बाद उन्हें तमाम गतिविधियों की आजादी हो और वे शिविरों तक ही सीमित ना रहें। साथ ही, विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह संयुक्त राष्ट्र में शरणार्थियों के उच्चायुक्त (यूएनएचसीआर) के उस आकलन से भी सहमत है, जिसमें कहा गया है कि रोहिंग्या शरणार्थियों की वापसी के लिए म्यामां में स्थिति अभी पूरी तरह अनुकूल नहीं है।