Wednesday, July 31, 2019

फ़ादर ऑफ़ मॉर्डन कॉर्डियोलॉज़ी से ट्रेनिंग

उन्हें मौका भी मिल गया और स्कॉलरशिप के जरिए वे 1947 में अमरीका पहुंच गए. पॉल डि व्हाइट से प्रशिक्षण के बाद श्रीनिवास चाहते तो अमरीका में ही ठहर सकते थे लेकिन वे बिहार लौट आए और पटना मेडिकल कॉलेज में काम शुरू किया.
तांडव आइंस्टीन समदर्शी के मुताबिक उस वक्त पीएमसीएच में कार्डियोलॉजी का कोई विभाग ही नहीं था. ऐसे में अलग अलग विभागों में ही श्रीनिवास को अपने मरीज तलाशने होते थे और जैसे तैसे उनका इलाज करना होता था.
ऐसे में एक दिन श्रीनिवास ने वो काम किया जो अमूमन सरकारी विभागों में होता नहीं है. उस दिलचस्प किस्से के बारे में समदर्शी बताते हैं, "एक बिल्डिंग खाली हुई थी तो अस्पताल प्रबंधन उसमें संक्रामक रोगों का विभाग शुरू करना चाहता था. लेकिन मेरे पिता ने रातों रात उसमें हृदयरोगियों को डाल दिया. फिर हंगामा हो गया कि श्रीनिवास ने सरकारी बिल्डिंग हड़प ली है."
"उनकी शिकायत हुई. एक कड़क स्वास्थ्य निदेशक होते थे कर्नल बीसी नाथ. उन्होंने पिताजी को बुलवा लिया और सीधे पूछा कि आपको सरकारी नौकरी करनी है कि नहीं, आपने सरकार की बिल्डिंग हड़प लिया, बिना परमिशन के आपने ऐसे कैसे किया?"
"तो मेरे पिताजी ने उन्हें अपनी तालीम के बारे में बताया और कहा कि मैं हृदय रोगियों को एक जगह देखना चाहता हूं तो बीसी नाथ ने कहा ठीक है कल मैं आपको बुलाकर फिर मिलूंगा. कल पिताजी जब अस्पताल पहुंचे तो उस जगह पर पूरा विभाग तैनात था, नर्स, दूसरे स्टाफ़, बेड और अन्य सुविधाएं. सब रातों रात हो गया. ये उस दौर में ब्यूरोक्रेसी की ताक़त और काम करने का नज़रिया था."
ल्दी ही श्रीनिवास ने पटना में इंदिरा गांधी इंस्टिट्यूट ऑफ़ कार्डियोलॉजी खड़ा कर दिया. इसकी कहानी भी उतनी ही दिलचस्प है. तांडव आइंस्टीन समदर्शी बताते हैं, "1966 में इंदिरा गांधी पहली बार प्रधानमंत्री बनीं तो पिताजी ने उनसे मिलने का समय लिया . समय मिल गया तो पिताजी ने इंदिरा जी से कहा कि हमलोग इस सेंटर का नाम आपके नाम पर रखना चाहते हैं और अनुमति चाहते हैं."
"उन्होंने अपने सचिव से कहा. तुरंत में पत्र तैयार हो गया. हाथों हाथ अनुमति पत्र मिलने के बाद जब पिताजी चलने लगे तो इंदिरा जी ने कहा आप इतना बड़ा संस्थान बना रहे हैं तो अर्थ की मदद नहीं चाहिए, पिताजी ने कहा वो भी चाहिए. तो उन्होंने पूछा कितने की मदद चाहिए. पिताजी ने कहा दस करोड़ रुपये मिल जाते तो अच्छा होता. इंदिरा जी ने कहा ठीक है. पिताजी पटना लौटे और उस पैसे की व्यवस्था उनके यहां आने से पहले हो चुकी थी."
श्रीनिवास से जुड़े इन किस्सों को आज बिहार की स्वास्थ्य सुविधाओं से जोड़कर देखिए तो ऐसा लगता है कि हालात लगातार बिगड़ते ही गए.
मौजूदा समय में बिहार की स्वास्थ्य सुविधाओं के लचर हाल पर तांडव समदर्शी बताते हैं, "कुछ तो राजनीतिक सोच की कमी है और कुछ ट्रेनिंग की भी कमी है. हम लोग हार्वर्ड में जब कोर्स कर रहे थे उस वक्त भी कंपैसन का कोर्स डॉक्टरों को पढ़ाते थे और बौद्ध भिक्षुक यह पढ़ाता था. आज भी पढ़ाता है. अपने यहां दूसरों के दुख को लेकर चिंता का भाव कहीं नहीं दिखता है, सिस्टम में सब कोई मैटिरियलिस्टक होने के पीछे भाग रहा है."
वैसे दिलचस्प यह है कि आज जो ईसीजी मशीन हर हॉस्पिटल में दिखाई देती है, वो श्रीनिवास ही पहली बार भारत लेकर आए थे. श्रीनिवास ने इंसानी पहचान के लिए ईसीजी से जुड़ा सिद्धांत भी दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि दो इंसानों के ईसीजी एकसमान नहीं होते.
तांडव आइंस्टीन समदर्शी बताते हैं, "पहले ईसीजी मशीन होती थी, उसमें बड़ी- बड़ी मशीनें होती थीं, तार-वार हाथ में लगाया जाता था, पांवों को बाल्टी जैसे उपकरण में रखा जाता था. अब जो पेपर निकलता है और स्टायलस मूव करता है, वो मशीन पहली बार भारत पिताजी लेकर आए थे. उस मशीन से पिताजी ने ना जाने कितने नामचीन लोगों की ईसीजी बनाई थी."
वैसे ये मशीन आज भी ठीक ठाक काम कर रही है, श्रीनिवास ने इसे लेकर बिहार सरकार को प्रस्ताव भी दिया था कि बेली रोड पर बने संग्रहालय में इसे रखने के लिए एक कोना दिया जाए, लेकिन उस पर बिहार सरकार ने कुछ ध्यान नहीं दिया.
समदर्शी कहते हैं, "पता नहीं सरकार का क्या सोचना है उस पर लेकिन हमलोगों ने महसूस किया कि उस संग्रहालय में उन लोगों को जगह मिलनी चाहिए जिन्होंने बिहार का नाम दुनिया भर में रोशन किया."