Friday, April 12, 2019

प्रधानमंत्री मोदी की बायोपिक की कहानी कितनी सच्ची

भारत में राजनीतिक दलों को भले ही अपनी आय का ब्योरा सार्वजनिक करना होता है मगर उनकी फ़ंडिंग को लेकर पारदर्शिता नहीं होती.
पिछले साल प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड जारी किए थे जिनके ज़रिये उद्योग और कारोबारी और आम लोग अपनी पहचान बताए बिना चंदा दे सकते हैं.
दानकर्ताओं ने इन बॉन्ड के ज़रिये 150 मिलियन डॉलर यानी क़रीब 10 अरब 35 करोड़ रुपए का चंदा दिया है और रिपोर्ट्स के मुताबिक़ इनमें से ज़्यादातर रक़म बीजेपी को मिली है.
भारत में महिलाएं भी बड़े पैमाने पर वोट कर रही हैं. इतनी ज़्यादा कि यह पहला आम चुनाव है जिसमें पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज़्यादा मतदान करेंगी.
महिला और पुरुष मतदाताओं के बीच की खाई तो 2014 में ही सिकुड़ गई थी जब महिला मतदाताओं का प्रतिशत 65.3 % रहा था जबकि पुरुषों का 67.1%.
2012 से 2018 के बीच दो दर्जन से अधिक स्थानीय चुनावों में दो तिहाई से अधिक राज्यों में पुरुषों के मुक़ाबले महिला मतदाताओं का मतदान प्रतिशत अधिक रहा.
राजनीतिक दलों ने महिलाओं के महत्व को समझा है और उन्हें अधिक 'प्रलोभन' देना शुरू कर दिया है- शिक्षा के लिए क़र्ज़, मुफ़्त गैस सिलेंडर और लड़कियों के लिए साइकिल.
2014 में मोदी ने बीजेपी और इसके सहयोगियों को ऐतिहासिक जीत दिलाई थी.
बीजेपी ने जिन 428 सीटों पर चुनाव लड़ा था, उनमें से 282 सीटें जीत ली थीं. 1984 के बाद से यह पहला मौक़ा था जब किसी पार्टी ने आम चुनाव में अकेले पूर्ण बहुमत हासिल किया था.
इस बड़ी जीत का श्रेय भ्रष्टाचार मुक्त 'अच्छे दिन' लाने का वादा करने वाले नरेंद्र मोदी को दिया गया जिनके अंदर ख़ुद को निर्णय लेने वाला और मेहनती नेता के तौर पर प्रचारित करने की क्षमता थी.
अपने वादों को पूरा करने में अच्छा प्रदर्शन न कर पाने के बावजूद मोदी अपनी पार्टी के लिए वोट खींचने वाला मुख्य चेहरा हैं. उन्हें पार्टी के अंदर की अनुशासित मशीनरी का समर्थन भी हासिल है जिसे उनके विश्वासपात्र और शक्तिशाली सहयोगी अमित शाह चलाते हैं.
विश्लेषक मानते हैं कि इस साल के आम चुनाव एक तरह से नरेंद्र मोदी के लिए जनमतसंग्रह हैं.
विपक्ष का अभियान पूरी तरह से प्रधानमंत्री को निशाने पर लेने पर केंद्रित रहेगा जो कि ध्रुवीकरण करने वाले ऐसे नेता हैं जिनके चाहने वाले भी हैं तो नापसंद करने वाले भी.
ऐसे में माना जा रहा है कि संसदीय चुनावों में राष्ट्रपति चुनावों जैसा मुक़ाबला हो रहा है. वोटों की गिनती के बाद ही पता चलेगा कि मोदी टिकाऊ ब्रैंड बने रहते हैं
पार्टी लगातार गर्त में जाती दिख रही थी. इसके नेता राहुल गांधी जो कि चर्चित नेहरू-गांधी परिवार की चौथी पीढ़ी से हैं, सोशल मीडिया पर चुटकुलों के पात्र बन गए थे.
मगर दिसंबर में पार्टी में नई जान सी आती दिखी.
पहले से अधिक आश्वस्त और ऊर्जावान राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने उत्तर भारत के तीन राज्यों में सरकार बनाने में सफलता पाई.
कई लोगों ने इसकी वजह सत्ता विरोधी लहर बताई क्योंकि तीन में से दो राज्यों में तो बीजेपी कई सालों से राज कर रही थी. मगर राहुल गांधी और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं से श्रेय नहीं छीना जा सकता.
साफ़ है कि कांग्रेस के अंदर फिर से पुराना जादू लौटा है. राहुल गांधी ने मोदी के सामने ख़ुद को एक खुले और समावेशी नेता के तौर पर पेश किया है. फिर एक चौंकाने वाले फ़ैसले के तहत उनकी बहन प्रियंका गांधी का पार्टी में आधिकारिक तौर पर आना पार्टी के प्रचार अभियान में नई जान डाल गया.
कांग्रेस के इस तरह से फिर से उठने से बिखरे पड़े विपक्ष में भी उत्साह आया है. इससे 2019 का मुक़ाबला पहले के अनुमानों से और अधिक कड़ा हो गया है.
7. अर्थव्यवस्था
मोदी के शासन में एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अपनी रफ़्तार खोती हुई नज़र आ रही है.
खेती की भरमार और सामानों के दाम घटने के कारण खेतों से होने वाली आय स्थिर हो गई. इससे किसान क़र्ज़ में डूब गए और सरकार से उनकी नाराज़गी बढ़ गई.
2016 में लिया गया विवादास्पद नोटबंदी का फैसला पेचीदा तो था ही, इसके अलावा इसे सही तरीक़े से लागू नहीं किया गया. जीएसटी भी लघु और मध्यम उद्योगों के लिए नुक़सानदेह रहा. भारत की विशाल अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में बहुत से लोग नौकरियां गंवा बैठे.
निर्यात घट गया है, बेरोज़गारी बढ़ गई है और मोदी सरकार पर नौकरियों का डाटा छिपाने का आरोप भी लगा है. यही नहीं, भारत में कई सरकारी बैंकों की हालत क़र्ज़दारों द्वारा ऋण न लौटाए जाने के कारण डूबने की कगार पर हैं.
या नहीं.
6. भारत की पुरातन पार्टी कर रही वापसी की उम्मीद
क्या 133 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी रसातल से बाहर निकल सकती है?
2014 में पार्टी को आम चुनावों में अपनी सबसे करारी हार का सामना करना पड़ा. इसकी सीटों की संख्या पिछले चुनावों (2009) की 206 सीटों की तुलना में 44 ही रह गई. इसे 20 प्रतिशत से भी कम मतदाताओं ने वोट दिया.
अगले चार सालों तक पार्टी राज्यों के चुनाव लगातार हारती चल गई और इसकी हालत पतली ही रही. 2018 के मध्य तक कांग्रेस और इसके सहयोगी दल मात्र तीन राज्यों में सरकार चला रहे थे जबकि बीजेपी की सरकार 20 राज्यों में थी.

Tuesday, April 2, 2019

'राजनीतिक दलों की साजिश'

बिहार में इस बात को हर कोई जानता है कि तेज प्रताप अपने बाग़ी तेवर के साथ पार्टी और परिवार में अलग-थलग पड़ गए हैं. तेज प्रताप ने पार्टी और परिवार के बाद पत्नी से भी विद्रोह कर लिया लेकिन यहां भी वो अकेले पड़ गए. आरजेडी के एक प्रवक्ता ने बताया कि राबड़ी देवी एश्वर्या को बहुत मानती हैं और तलाक़ के मामले में पूरा परिवार तेज प्रताप नहीं बल्कि एशवर्या के साथ खड़ा है.
1990 के दशक से लेकर 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव तक लालू प्रसाद का बिहार के चुनाव में प्रभावी दख़ल रहा है लेकिन 2019 के आम चुनाव में जब राष्ट्रीय जनता दल सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा है तो लालू जेल में हैं. यह तेजस्वी के लिए भी इम्तिहान है लेकिन तेज प्रताप उनके लिए सबसे बड़ा सवाल बन गए हैं.
मेरठ के हाशिमपुरा मोहल्ले को एक सड़क चीरती हुई निकलती है और इसे दो भागों में बाट देती है. इसके एक तरफ़ हाजी बाबुद्दीन जैसे मुस्लिम आबाद हैं और दूसरी तरफ विपिन कुमार रस्तोगी जैसे हिन्दुओं की दुकानें हैं.
बाबुद्दीन और रस्तोगी एक दूसरे को 30 साल से जानते हैं लेकिन इनकी दुनिया बिलकुल अलग है.
बाबुद्दीन भारतीय जनता पार्टी के कट्टर विरोधी हैं और रस्तोगी इस पार्टी के कड़े समर्थक. हमेशा की तरह इस बार भी तय है कि 11 अप्रैल को आम चुनाव के पहले चरण में बाबुद्दीन महागठबंधन के प्रत्याशी और पूर्व राज्य मंत्री हाजी याक़ूब क़ुरैशी को अपना वोट देंगे और रस्तोगी दो बार सांसद रह चुके बीजेपी के उमीदवार राजेंद्र अग्रवाल को.
इनके बीच कुछ समान नहीं है. लेकिन, पिछले 30 सालों से एक सच ने इन्हें एक-दूसरे से कस कर बाँध रखा है और वो है कारोबार में एक-दूसरे पर निर्भरता. वहां रहने वाले लोगों के अनुसार ये कारोबार सालाना 300 करोड़ रुपये का है.
बाबुद्दीन 120 पॉवरलूम मशीनों के मालिक हैं और मेरठ के दो सबसे अमीर बुनकरों में से एक हैं. दो मंज़िला घर के ऊपर वो अपने परिवार के साथ रहते हैं जहाँ अभी उन्होंने एक आधुनिक रसोई घर बनवाई है, जिसे वो गर्व के साथ लोगों को दिखाते हैं. हिंदू मुसलमान विवादों के आविष्कार का सियासी फ़ॉर्मूला
मकान के नीचे कपड़ा बनाने वाली मशीनें लगी हैं जिनसे हर वक़्त तेज़ आवाज़ें निकलती रहती हैं.
उनके कारख़ाने में कपड़े बनते हैं जिसे रस्तोगी थोक में ख़रीदते हैं. वो बाबुद्दीन के अकेले ग्राहक नहीं हैं लेकिन उनके सभी हिन्दू थोक ग्राहकों में सबसे ज़्यादा माल ख़रीदने वाले ज़रूर हैं.
बाबुद्दीन कहते हैं, "हिन्दू थोक दुकानदारों के बग़ैर मेरा काम नहीं चलता और हम बुनकरों के बग़ैर उनका नहीं. हम एक-दूसरे पर पूरी तरह से निर्भर हैं."
रस्तोगी के मुताबिक़, "धंधे में विचारधारा, धर्म और जाती काम नहीं आतीं. बाबुद्दीन को मैं 30 सालों से जानता हूँ. वो एक परिवार की तरह हैं. हमारे विचार अलग हैं. हम वोट अलग-अलग पार्टियों को देते हैं. मज़ाक़ में एक-दूसरे की खिंचाई ज़रूर करते हैं मगर हम धंधे में भावना को जगह नहीं देते."
आर्थिक मजबूरी उन्हें एक-दूसरे से बांध कर रखती है. थोड़े समय के लिए रस्तोगी ने एक अलग व्यापार शुरू किया था जो नहीं चला. जब वो वापस लौटे तो उनका अनुभव बहुत अच्छा था.
वो भावुक होकर कहते हैं, "मुस्लिम बुनकरों ने मेरा ऐसा स्वागत किया कि मुझे लगा कि मैं अपने परिवार में वापस आ गया हूँ."
कपड़ों के अलावा कई दूसरे व्यवसायों में भी हिन्दू-मुस्लिम समाज की एक-दूसरे पर निर्भरता दिखाई देती है जो सराहनीय है क्यूंकि सांप्रदायिक दंगों के इतिहास वाला मेरठ शहर हिन्दू-मुस्लिम के बीच नाज़ुक रिश्ते के लिए जाना जाता है.
अफवाहों के कारण भी यहाँ सांप्रदायिक तनाव पैदा हो जाता है. लेकिन बाबुद्दीन और रस्तोगी जैसे लोगों के बीच घनिष्ट संबंधों के कारण अक्सर मामला बेकाबू नहीं होता.
मेरठ के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दूसरे शहरों और ग्रामीण इलाक़ों में भी हिन्दू-मुस्लिम आर्थिक निर्भरता की मिसालें मिलती हैं. शामली के सलीम त्यागी कहते हैं कि उनके शहर में गन्ने की काश्त हो या मुरादाबाद में पीतल का काम दोनों समुदायों का एक-दूसरे के बग़ैर गुज़ारा नहीं हो सकता.
कैराना में बीजेपी कार्यकर्ता शिव कुमार चौहान गुर्जर समाज से हैं. जब हमने उनसे बात की तो उनके साथ बीजेपी के कुछ और कार्यकर्ता भी बैठे थे.
हुक़्क़े पे चली चर्चा के दौरान उन्होंने बताया कि यहाँ चुनाव में बीजेपी और गठबंधन दोनों ने गुर्जर उम्मीदवार खड़े किये हैं. समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) के महागठबंधन की उम्मीदवार तबस्सुम हसन आरएलडी की हैं. उन्होंने जब 2018 में उपचुनाव जीता था तो उन्हें हिन्दू और मुस्लिम गुर्जरों दोनों ने वोट दिया था.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की आबादी 27 प्रतिशत है. राष्ट्रीय औसत केवल 14 प्रतिशत के मुक़ाबले में ये कहीं ज़्यादा है. इनमें 70 प्रतिशत किसान हैं.
यहाँ के अधिकतर मुसलमान ग़रीब हैं. उनके पूर्वज हिन्दू थे. इसलिए जाट और गुर्जर हिन्दू समाज में भी हैं और मुस्लिम समुदाय में भी. अधिकतर मुस्लिम धनी हिन्दू जाटों के खेतों पर काम करते हैं.
पिछले आम चुनाव से पहले मुज़फ़्फ़रनगर और शामली जैसे शहरों और देहातों में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे जिसमें हिन्दू जाटों और मुस्लिम समाज के बीच दशकों से चली आ रही सांप्रदायिक सद्भावना प्रभावित हुई थी.
इसका नतीजा ये हुआ कि समाज सांप्रदायिक मुद्दों पर बंट गया. मतों के ध्रुवीकरण के नतीजे में हिन्दुओं ने बीजेपी को वोट दिया और मुसलमानों ने बीजेपी के ख़िलाफ़.
बीजेपी ने यहाँ की तमाम 8 सीटें आसानी से जीत लीं. पहले चरण के रुझान को देखते हुए बाक़ी के चरणों में उत्तर प्रदेश के दूसरे इलाक़ों में भी मत बीजेपी के हक़ में पड़ा. पार्टी ने राज्य की 80 सीटों में से 71 सीटें जीतीं.