भारत में राजनीतिक दलों को भले ही अपनी आय का ब्योरा सार्वजनिक करना होता है मगर उनकी फ़ंडिंग को लेकर पारदर्शिता नहीं होती.
पिछले साल प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड जारी किए थे जिनके ज़रिये उद्योग और कारोबारी और आम लोग अपनी पहचान बताए बिना चंदा दे सकते हैं.
दानकर्ताओं ने इन बॉन्ड के ज़रिये 150 मिलियन डॉलर यानी क़रीब 10 अरब 35 करोड़ रुपए का चंदा दिया है और रिपोर्ट्स के मुताबिक़ इनमें से ज़्यादातर रक़म बीजेपी को मिली है.
भारत में महिलाएं भी बड़े पैमाने पर वोट कर रही हैं. इतनी ज़्यादा कि यह पहला आम चुनाव है जिसमें पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज़्यादा मतदान करेंगी.
महिला और पुरुष मतदाताओं के बीच की खाई तो 2014 में ही सिकुड़ गई थी जब महिला मतदाताओं का प्रतिशत 65.3 % रहा था जबकि पुरुषों का 67.1%.
2012 से 2018 के बीच दो दर्जन से अधिक स्थानीय चुनावों में दो तिहाई से अधिक राज्यों में पुरुषों के मुक़ाबले महिला मतदाताओं का मतदान प्रतिशत अधिक रहा.
राजनीतिक दलों ने महिलाओं के महत्व को समझा है और उन्हें अधिक 'प्रलोभन' देना शुरू कर दिया है- शिक्षा के लिए क़र्ज़, मुफ़्त गैस सिलेंडर और लड़कियों के लिए साइकिल.
2014 में मोदी ने बीजेपी और इसके सहयोगियों को ऐतिहासिक जीत दिलाई थी.
बीजेपी ने जिन 428 सीटों पर चुनाव लड़ा था, उनमें से 282 सीटें जीत ली थीं. 1984 के बाद से यह पहला मौक़ा था जब किसी पार्टी ने आम चुनाव में अकेले पूर्ण बहुमत हासिल किया था.
इस बड़ी जीत का श्रेय भ्रष्टाचार मुक्त 'अच्छे दिन' लाने का वादा करने वाले नरेंद्र मोदी को दिया गया जिनके अंदर ख़ुद को निर्णय लेने वाला और मेहनती नेता के तौर पर प्रचारित करने की क्षमता थी.
अपने वादों को पूरा करने में अच्छा प्रदर्शन न कर पाने के बावजूद मोदी अपनी पार्टी के लिए वोट खींचने वाला मुख्य चेहरा हैं. उन्हें पार्टी के अंदर की अनुशासित मशीनरी का समर्थन भी हासिल है जिसे उनके विश्वासपात्र और शक्तिशाली सहयोगी अमित शाह चलाते हैं.
विश्लेषक मानते हैं कि इस साल के आम चुनाव एक तरह से नरेंद्र मोदी के लिए जनमतसंग्रह हैं.
विपक्ष का अभियान पूरी तरह से प्रधानमंत्री को निशाने पर लेने पर केंद्रित रहेगा जो कि ध्रुवीकरण करने वाले ऐसे नेता हैं जिनके चाहने वाले भी हैं तो नापसंद करने वाले भी.
ऐसे में माना जा रहा है कि संसदीय चुनावों में राष्ट्रपति चुनावों जैसा मुक़ाबला हो रहा है. वोटों की गिनती के बाद ही पता चलेगा कि मोदी टिकाऊ ब्रैंड बने रहते हैं
पार्टी लगातार गर्त में जाती दिख रही थी. इसके नेता राहुल गांधी जो कि चर्चित नेहरू-गांधी परिवार की चौथी पीढ़ी से हैं, सोशल मीडिया पर चुटकुलों के पात्र बन गए थे.
मगर दिसंबर में पार्टी में नई जान सी आती दिखी.
पहले से अधिक आश्वस्त और ऊर्जावान राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने उत्तर भारत के तीन राज्यों में सरकार बनाने में सफलता पाई.
कई लोगों ने इसकी वजह सत्ता विरोधी लहर बताई क्योंकि तीन में से दो राज्यों में तो बीजेपी कई सालों से राज कर रही थी. मगर राहुल गांधी और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं से श्रेय नहीं छीना जा सकता.
साफ़ है कि कांग्रेस के अंदर फिर से पुराना जादू लौटा है. राहुल गांधी ने मोदी के सामने ख़ुद को एक खुले और समावेशी नेता के तौर पर पेश किया है. फिर एक चौंकाने वाले फ़ैसले के तहत उनकी बहन प्रियंका गांधी का पार्टी में आधिकारिक तौर पर आना पार्टी के प्रचार अभियान में नई जान डाल गया.
कांग्रेस के इस तरह से फिर से उठने से बिखरे पड़े विपक्ष में भी उत्साह आया है. इससे 2019 का मुक़ाबला पहले के अनुमानों से और अधिक कड़ा हो गया है.
7. अर्थव्यवस्था
मोदी के शासन में एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अपनी रफ़्तार खोती हुई नज़र आ रही है.
खेती की भरमार और सामानों के दाम घटने के कारण खेतों से होने वाली आय स्थिर हो गई. इससे किसान क़र्ज़ में डूब गए और सरकार से उनकी नाराज़गी बढ़ गई.
2016 में लिया गया विवादास्पद नोटबंदी का फैसला पेचीदा तो था ही, इसके अलावा इसे सही तरीक़े से लागू नहीं किया गया. जीएसटी भी लघु और मध्यम उद्योगों के लिए नुक़सानदेह रहा. भारत की विशाल अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में बहुत से लोग नौकरियां गंवा बैठे.
निर्यात घट गया है, बेरोज़गारी बढ़ गई है और मोदी सरकार पर नौकरियों का डाटा छिपाने का आरोप भी लगा है. यही नहीं, भारत में कई सरकारी बैंकों की हालत क़र्ज़दारों द्वारा ऋण न लौटाए जाने के कारण डूबने की कगार पर हैं.
या नहीं.
6. भारत की पुरातन पार्टी कर रही वापसी की उम्मीद
क्या 133 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी रसातल से बाहर निकल सकती है?
2014 में पार्टी को आम चुनावों में अपनी सबसे करारी हार का सामना करना पड़ा. इसकी सीटों की संख्या पिछले चुनावों (2009) की 206 सीटों की तुलना में 44 ही रह गई. इसे 20 प्रतिशत से भी कम मतदाताओं ने वोट दिया.
अगले चार सालों तक पार्टी राज्यों के चुनाव लगातार हारती चल गई और इसकी हालत पतली ही रही. 2018 के मध्य तक कांग्रेस और इसके सहयोगी दल मात्र तीन राज्यों में सरकार चला रहे थे जबकि बीजेपी की सरकार 20 राज्यों में थी.
पिछले साल प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड जारी किए थे जिनके ज़रिये उद्योग और कारोबारी और आम लोग अपनी पहचान बताए बिना चंदा दे सकते हैं.
दानकर्ताओं ने इन बॉन्ड के ज़रिये 150 मिलियन डॉलर यानी क़रीब 10 अरब 35 करोड़ रुपए का चंदा दिया है और रिपोर्ट्स के मुताबिक़ इनमें से ज़्यादातर रक़म बीजेपी को मिली है.
भारत में महिलाएं भी बड़े पैमाने पर वोट कर रही हैं. इतनी ज़्यादा कि यह पहला आम चुनाव है जिसमें पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज़्यादा मतदान करेंगी.
महिला और पुरुष मतदाताओं के बीच की खाई तो 2014 में ही सिकुड़ गई थी जब महिला मतदाताओं का प्रतिशत 65.3 % रहा था जबकि पुरुषों का 67.1%.
2012 से 2018 के बीच दो दर्जन से अधिक स्थानीय चुनावों में दो तिहाई से अधिक राज्यों में पुरुषों के मुक़ाबले महिला मतदाताओं का मतदान प्रतिशत अधिक रहा.
राजनीतिक दलों ने महिलाओं के महत्व को समझा है और उन्हें अधिक 'प्रलोभन' देना शुरू कर दिया है- शिक्षा के लिए क़र्ज़, मुफ़्त गैस सिलेंडर और लड़कियों के लिए साइकिल.
2014 में मोदी ने बीजेपी और इसके सहयोगियों को ऐतिहासिक जीत दिलाई थी.
बीजेपी ने जिन 428 सीटों पर चुनाव लड़ा था, उनमें से 282 सीटें जीत ली थीं. 1984 के बाद से यह पहला मौक़ा था जब किसी पार्टी ने आम चुनाव में अकेले पूर्ण बहुमत हासिल किया था.
इस बड़ी जीत का श्रेय भ्रष्टाचार मुक्त 'अच्छे दिन' लाने का वादा करने वाले नरेंद्र मोदी को दिया गया जिनके अंदर ख़ुद को निर्णय लेने वाला और मेहनती नेता के तौर पर प्रचारित करने की क्षमता थी.
अपने वादों को पूरा करने में अच्छा प्रदर्शन न कर पाने के बावजूद मोदी अपनी पार्टी के लिए वोट खींचने वाला मुख्य चेहरा हैं. उन्हें पार्टी के अंदर की अनुशासित मशीनरी का समर्थन भी हासिल है जिसे उनके विश्वासपात्र और शक्तिशाली सहयोगी अमित शाह चलाते हैं.
विश्लेषक मानते हैं कि इस साल के आम चुनाव एक तरह से नरेंद्र मोदी के लिए जनमतसंग्रह हैं.
विपक्ष का अभियान पूरी तरह से प्रधानमंत्री को निशाने पर लेने पर केंद्रित रहेगा जो कि ध्रुवीकरण करने वाले ऐसे नेता हैं जिनके चाहने वाले भी हैं तो नापसंद करने वाले भी.
ऐसे में माना जा रहा है कि संसदीय चुनावों में राष्ट्रपति चुनावों जैसा मुक़ाबला हो रहा है. वोटों की गिनती के बाद ही पता चलेगा कि मोदी टिकाऊ ब्रैंड बने रहते हैं
पार्टी लगातार गर्त में जाती दिख रही थी. इसके नेता राहुल गांधी जो कि चर्चित नेहरू-गांधी परिवार की चौथी पीढ़ी से हैं, सोशल मीडिया पर चुटकुलों के पात्र बन गए थे.
मगर दिसंबर में पार्टी में नई जान सी आती दिखी.
पहले से अधिक आश्वस्त और ऊर्जावान राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने उत्तर भारत के तीन राज्यों में सरकार बनाने में सफलता पाई.
कई लोगों ने इसकी वजह सत्ता विरोधी लहर बताई क्योंकि तीन में से दो राज्यों में तो बीजेपी कई सालों से राज कर रही थी. मगर राहुल गांधी और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं से श्रेय नहीं छीना जा सकता.
साफ़ है कि कांग्रेस के अंदर फिर से पुराना जादू लौटा है. राहुल गांधी ने मोदी के सामने ख़ुद को एक खुले और समावेशी नेता के तौर पर पेश किया है. फिर एक चौंकाने वाले फ़ैसले के तहत उनकी बहन प्रियंका गांधी का पार्टी में आधिकारिक तौर पर आना पार्टी के प्रचार अभियान में नई जान डाल गया.
कांग्रेस के इस तरह से फिर से उठने से बिखरे पड़े विपक्ष में भी उत्साह आया है. इससे 2019 का मुक़ाबला पहले के अनुमानों से और अधिक कड़ा हो गया है.
7. अर्थव्यवस्था
मोदी के शासन में एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अपनी रफ़्तार खोती हुई नज़र आ रही है.
खेती की भरमार और सामानों के दाम घटने के कारण खेतों से होने वाली आय स्थिर हो गई. इससे किसान क़र्ज़ में डूब गए और सरकार से उनकी नाराज़गी बढ़ गई.
2016 में लिया गया विवादास्पद नोटबंदी का फैसला पेचीदा तो था ही, इसके अलावा इसे सही तरीक़े से लागू नहीं किया गया. जीएसटी भी लघु और मध्यम उद्योगों के लिए नुक़सानदेह रहा. भारत की विशाल अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में बहुत से लोग नौकरियां गंवा बैठे.
निर्यात घट गया है, बेरोज़गारी बढ़ गई है और मोदी सरकार पर नौकरियों का डाटा छिपाने का आरोप भी लगा है. यही नहीं, भारत में कई सरकारी बैंकों की हालत क़र्ज़दारों द्वारा ऋण न लौटाए जाने के कारण डूबने की कगार पर हैं.
या नहीं.
6. भारत की पुरातन पार्टी कर रही वापसी की उम्मीद
क्या 133 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी रसातल से बाहर निकल सकती है?
2014 में पार्टी को आम चुनावों में अपनी सबसे करारी हार का सामना करना पड़ा. इसकी सीटों की संख्या पिछले चुनावों (2009) की 206 सीटों की तुलना में 44 ही रह गई. इसे 20 प्रतिशत से भी कम मतदाताओं ने वोट दिया.
अगले चार सालों तक पार्टी राज्यों के चुनाव लगातार हारती चल गई और इसकी हालत पतली ही रही. 2018 के मध्य तक कांग्रेस और इसके सहयोगी दल मात्र तीन राज्यों में सरकार चला रहे थे जबकि बीजेपी की सरकार 20 राज्यों में थी.